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उत्तर प्रदेश: बरेली में दो नोडल अधिकारी, फिर भी झोलाछापों पर नहीं लग रहा अंकुश
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संक्षेप
उत्तर प्रदेश: बरेली जिले में झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई और निगरानी के लिए स्वास्थ्य विभाग ने नोडल अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर रखी है, इसके बावजूद ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में कथित अवैध क्लीनिकों के संचालन के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं।
विस्तार
उत्तर प्रदेश: बरेली जिले में झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई और निगरानी के लिए स्वास्थ्य विभाग ने नोडल अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर रखी है, इसके बावजूद ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में कथित अवैध क्लीनिकों के संचालन के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। गलत इलाज, ऑपरेशन में लापरवाही और गलत इंजेक्शन से मरीजों की मौत के आरोपों ने स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालिया मामला दो माह की गर्भवती महिला की इलाज के दौरान मौत से जुड़ा बताया जा रहा है, जिसमें गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए गए हैं। मामले ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब झोलाछापों पर नजर रखने के लिए विभागीय स्तर पर अधिकारी तैनात हैं, तो आखिर अवैध रूप से चिकित्सा सेवाएं देने वालों पर प्रभावी रोक क्यों नहीं लग पा रही है। साथ ही यह भी सवाल उठ रहा है कि कार्रवाई के बाद बंद किए गए क्लीनिक दोबारा संचालित हो रहे हैं या नहीं, इसकी निगरानी किस स्तर पर की जा रही है। दो अधिकारियों को दी गई जिम्मेदारी सीएमओ डॉ. विश्राम सिंह ने जिले में झोलाछाप डॉक्टरों से जुड़े मामलों और स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी के लिए अलग-अलग अधिकारियों को जिम्मेदारी दे रखी है। जानकारी के मुताबिक डॉ. सुचिता गंगवार को झोलाछाप और आईजीआरएस से संबंधित मामलों की नोडल अधिकारी बनाया गया है। वहीं डॉ. लईक अंसारी 50 बेड तक के अस्पतालों के पंजीकरण से संबंधित जिम्मेदारी देखते हैं। विभागीय सूत्रों के अनुसार डॉ. सुचिता गंगवार की करीब दो महीने पहले बरेली में तैनाती हुई है। वहीं झोलाछापों से जुड़े मामलों में डॉ. लईक अंसारी को पूर्व अनुभव होने के कारण उनसे भी संबंधित मामलों में जानकारी ली जाती रही है। हालांकि लगातार सामने आ रहे मामलों के बीच विभाग की कार्रवाई और निगरानी व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं। 500 से अधिक अवैध क्लीनिक होने का दावा ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में 500 से अधिक अवैध क्लीनिक और कथित झोलाछापों के सक्रिय होने का दावा किया जा रहा है। विभागीय स्तर पर इस वर्ष 40 से अधिक अवैध क्लीनिकों को सील करने और करीब 12 मामलों में नामजद एफआईआर दर्ज कराने की बात कही गई है। हालांकि इन आंकड़ों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।इसके बावजूद सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि लगातार छापेमारी और सीलिंग की कार्रवाई हो रही है, तो झोलाछापों का नेटवर्क पूरी तरह खत्म क्यों नहीं हो रहा। क्या कार्रवाई के बाद कुछ क्लीनिक दोबारा खुल रहे हैं? यदि ऐसा है तो उनकी दोबारा निगरानी और कार्रवाई की जिम्मेदारी किसकी है? वहीं मरीजों की मौत से जुड़े मामलों में जांच और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है। अधिकारियों से संपर्क का प्रयास लगातार सामने आ रहे मामलों और विभाग की कार्रवाई को लेकर सीएमओ डॉ. विश्राम सिंह और नोडल अधिकारी डॉ. सुचिता गंगवार से फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन दोनों अधिकारियों ने फोन रिसीव नहीं किया। इस वजह से इस मामले में उनका पक्ष सामने नहीं आ सका। वहीं डॉ. लईक अहमद अंसारी ने मामले से किनारा करते हुए कहा कि उनके पास झोलाछाप से संबंधित नोडल अधिकारी की जिम्मेदारी नहीं है और इस मामले में डॉ. सुचिता गंगवार ही बयान देंगी। झोलाछापों के खिलाफ कार्रवाई के बावजूद लगातार सामने आ रहे शिकायतों और मौत के आरोपों ने स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि विभाग इन मामलों में कितनी गंभीरता से जांच करता है और अवैध रूप से चिकित्सा सेवाएं देने वालों के खिलाफ आगे क्या कार्रवाई की जाती है।
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