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राजस्थान: नवपद ओली के तीसरे दिन आचार्य पद की आराधना, साध्वीश्री ने बताया महत्व
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संक्षेप
राजस्थान: रांगड़ी चौक स्थित पौषधशाला में तपागच्छीय गच्छाधिपति पद्मश्री आचार्य श्रीमद् विजय नित्यानंदसूरिश्वरजी महाराज साहेब की आज्ञानुवर्तिनी साध्वीश्री प्रीतिरत्ना, साध्वीश्री प्रीतिसुधा एवं साध्वीश्री प्रीतियशा महाराजसा आदि ठाणा-3 की पावन निश्रा में चल रही नौ दिवसीय श्री
विस्तार
राजस्थान: रांगड़ी चौक स्थित पौषधशाला में तपागच्छीय गच्छाधिपति पद्मश्री आचार्य श्रीमद् विजय नित्यानंदसूरिश्वरजी महाराज साहेब की आज्ञानुवर्तिनी साध्वीश्री प्रीतिरत्ना, साध्वीश्री प्रीतिसुधा एवं साध्वीश्री प्रीतियशा महाराजसा आदि ठाणा-3 की पावन निश्रा में चल रही नौ दिवसीय श्री नवपद ओली आराधना के तीसरे दिन मंगलवार को सिद्धचक्र के तीसरे पद आचार्य पद की आराधना की गई। इस अवसर पर साध्वीश्री प्रीतिसुधा महाराजसा ने प्रवचन में आचार्य भगवंतों के गुणों, संयमित जीवन, शास्त्रज्ञान, संघ संचालन और जिनशासन के प्रति समर्पण का विवेचन किया। उन्होंने कहा कि आचार्य केवल ज्ञान के भंडार नहीं, बल्कि आचरण के आदर्श भी होते हैं। उनका जीवन साधना, अनुशासन, विनय और धर्ममर्यादा का उदाहरण होता है। आचार्य पद की आराधना तभी सार्थक है, जब उनके गुणों से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को भी धर्ममय बनाया जाए। साध्वीश्री ने जैन परंपरा में वर्णित कालकाचार्य के प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि इंद्र ने सूक्ष्म जीवों और निगोद के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए ब्राह्मण का रूप धारण कर कालकाचार्य से प्रश्न किए। साध्वीश्री ने आचार्य विजयानंदसूरिश्वरजी, जिन्हें आत्मारामजी महाराज के नाम से भी जाना जाता है, की ज्ञान-साधना का स्मरण किया। साथ ही आचार्य विजय वल्लभसूरिश्वरजी के जिनशासन और संघ के प्रति समर्पण का उल्लेख करते हुए विभाजनकालीन प्रसंग सुनाया। जैन परंपरा में वर्णित इस प्रसंग के अनुसार, वर्ष 1947 में गुजरांवाला में रहते हुए आचार्य विजय वल्लभसूरिश्वरजी ने संघ के सदस्यों के सुरक्षित भारत पहुंचने तक वहां से जाने से इनकार किया था। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने बताया कि सच्चे आचार्य का जीवन आत्मसाधना के साथ संघ की रक्षा, धर्म की मर्यादा और जीवों के कल्याण के प्रति भी समर्पित रहता है।साध्वीश्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि गुरु और गच्छ के प्रति श्रद्धा को आपसी मतभेदों से प्रभावित नहीं होने देना चाहिए। पंच परमेष्ठी की आराधना में आचार्य पद का विशेष महत्व है, क्योंकि आचार्य भगवंत साधु-साध्वी संघ को अनुशासन, शास्त्रज्ञान और संयम का मार्ग दिखाते हैं। उन्होंने ओली के दौरान आयंबिल तप के नियमों का पालन करने, नियमित स्वाध्याय करने और प्रतिदिन पांच जिनमंदिरों में से किसी एक मंदिर के दर्शन का क्रम बनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि धर्म को जीवन में उतारने के लिए साधना निरंतर, दृढ़ और अनुशासित होनी चाहिए। चातुर्मास लाभार्थी परिवार के शांतिलाल सेठिया व सुरेन्द्र बद्धाणी ने श्रीसकल संघ को संबोधित करते हुए कहा कि साध्वीवृंद के पावन सान्निध्य में धर्मज्ञान प्राप्त करने और उसे जीवन में उतारने का अवसर मिलना महत्वपूर्ण है। उन्होंने श्रावक-श्राविकाओं से प्रवचनों में अधिकाधिक सहभागिता कर धर्म के मूल सिद्धांतों, तप और स्वाध्याय का लाभ लेने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि नियमित धर्मश्रवण से जिनशासन के प्रति श्रद्धा दृढ़ होती है और धर्माचरण को जीवन में अपनाने की प्रेरणा मिलती है। इस अवसर पर कल्याण मित्र मंडल की ओर से गुड़ की प्रभावना की गई। नवपद ओली के चौथे दिन बुधवार को उपाध्याय पद की आराधना होगी।
आचार्य ने सूक्ष्म जीवों की अवस्था और उनके अस्तित्व का विवेचन किया, जिससे इंद्र उनके ज्ञान से प्रभावित हुए। इस प्रसंग के माध्यम से साध्वीश्री ने समझाया कि जैन आचार्य गहन शास्त्रज्ञान, सूक्ष्म चिंतन और अध्ययन-साधना के बल पर जिनशासन की परंपरा को समृद्ध करते रहे हैं। उन्होंने कहा कि आचार्य पद केवल पदवी नहीं, बल्कि कठोर संयम, गहन स्वाध्याय और पंचाचार के पालन की जिम्मेदारी है। ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार और वीर्याचार का पालन आचार्य जीवन का महत्वपूर्ण आधार है। आचार्य स्वयं इनका पालन करते हैं और साधु-साध्वी संघ को भी इनके अनुरूप चलने की प्रेरणा देते हैं। जैन परंपरा में आचार्य भगवंतों के 36 मूल गुणों का वर्णन मिलता है। साध्वीश्री ने कहा कि आचार्य पद की आराधना हमें अपने जीवन में संयम, अनुशासन और धर्माचरण अपनाने की प्रेरणा देती है।